तृतीया श्राद्ध 2026
पितृ पक्ष में हर तिथि का अपना विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान परिवार के लोग अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान तथा दान जैसे धार्मिक कार्य करते हैं। पितृ पक्ष की तीसरी तिथि को किया जाने वाला श्राद्ध तृतीया श्राद्ध कहलाता है। इसे कई जगह तीज श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, जिन परिवार के सदस्यों का निधन तृतीया तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्ध पितृ पक्ष की तृतीया तिथि पर किया जाता है।
तृतीया श्राद्ध 2026 कब है?
साल 2026 में तृतीया श्राद्ध मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। यह पितृ पक्ष के शुरुआती महत्वपूर्ण श्राद्ध दिनों में से एक है। पंचांग के अनुसार यह आश्विन कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि होगी।दिए गए पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि 28 सितंबर 2026 को शाम 7:13 बजे शुरू होगी और 29 सितंबर 2026 को शाम 5:09 बजे समाप्त होगी। इसलिए तृतीया श्राद्ध 29 सितंबर को किया जाएगा। अन्य पंचांग स्रोतों में भी 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध बताया गया है।
तृतीया श्राद्ध 2026 की मुख्य जानकारी
- तिथि: तृतीया
- तारीख: 29 सितंबर 2026
- दिन: मंगलवार
- पक्ष: कृष्ण पक्ष
- मास: आश्विन
- श्राद्ध: तृतीया श्राद्ध
- अन्य नाम: तीज श्राद्ध
- तृतीया तिथि प्रारंभ: 28 सितंबर 2026, शाम 7:13 बजे
- तृतीया तिथि समाप्त: 29 सितंबर 2026, शाम 5:09 बजे
पितृ पक्ष की तिथियों की सूची में भी 29 सितंबर 2026 को तृतीया श्राद्ध के साथ महा भरणी का उल्लेख मिलता है।
तृतीया श्राद्ध का महत्व
तृतीया श्राद्ध का मुख्य उद्देश्य उन पूर्वजों का सम्मानपूर्वक स्मरण करना है जिनका निधन तृतीया तिथि को हुआ था। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृ पक्ष में जिस तिथि को पूर्वज का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर श्राद्ध करना विशेष माना जाता है।
श्राद्ध के माध्यम से परिवार अपने पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करता है। इस दिन तर्पण, पिंडदान, भोजन और दान जैसे कर्म किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता में यह भी कहा जाता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध से पितरों की संतुष्टि होती है और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
तृतीया श्राद्ध को केवल एक धार्मिक कर्मकांड के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह अपने पूर्वजों को याद करने और परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाने का अवसर भी है। इस दिन परिवार के सदस्य अपने दिवंगत प्रियजनों को याद करते हैं और उनके अच्छे कार्यों को स्मरण करते हैं।
तृतीया श्राद्ध की पूजा विधि
तृतीया श्राद्ध की विधि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में थोड़ी अलग हो सकती है। सामान्य रूप से इस दिन निम्न तरीके से श्राद्ध कर्म किया जाता है।
1. सुबह स्नान करके शुद्ध हों
श्राद्ध के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर पूजा और श्राद्ध कर्म की तैयारी करनी चाहिए। जिस स्थान पर श्राद्ध कर्म किया जाना है, उसे भी साफ रखना चाहिए।
श्राद्ध के दौरान मन को शांत रखना और पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करना महत्वपूर्ण माना जाता है।
2. पूर्वजों का स्मरण करें
श्राद्ध कर्म शुरू करने से पहले अपने दिवंगत पूर्वजों का ध्यान किया जाता है। परंपरा के अनुसार पितरों का नाम, गोत्र और अन्य आवश्यक जानकारी का स्मरण किया जा सकता है।
इस समय परिवार के सदस्य अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और सद्गति के लिए प्रार्थना करते हैं।
3. तर्पण करें
तृतीया श्राद्ध में तर्पण का विशेष स्थान है। तर्पण के दौरान जल अर्पित करके पितरों का स्मरण किया जाता है। कई परंपराओं में जल के साथ काले तिल का भी प्रयोग किया जाता है।
तर्पण का उद्देश्य पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना और उनके लिए प्रार्थना करना है। तर्पण की सही दिशा, विधि और मंत्र परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं, इसलिए विशेष अनुष्ठान के लिए पुरोहित से मार्गदर्शन लिया जा सकता है।
4. पिंडदान करें
कई परिवारों में श्राद्ध के दौरान पिंडदान करने की परंपरा होती है। पिंड सामान्य रूप से चावल आदि से बनाए जाते हैं और विधि के अनुसार पितरों को अर्पित किए जाते हैं।
पिंडदान की पूरी विधि क्षेत्रीय परंपरा और परिवार के संस्कारों पर निर्भर करती है। यदि परिवार में पिंडदान की परंपरा है, तो इसे योग्य पुरोहित के मार्गदर्शन में करना उचित माना जाता है।
5. ब्राह्मण भोजन कराएं
श्राद्ध के अवसर पर ब्राह्मण को भोजन कराने की परंपरा भी प्रचलित है। परिवार अपनी क्षमता के अनुसार सात्विक भोजन तैयार करता है और श्रद्धापूर्वक भोजन कराता है।
भोजन के बाद दक्षिणा या उपयोगी वस्तुओं का दान करने की परंपरा भी कई परिवारों में होती है।
6. कौए को भोजन दें
पितृ पक्ष में कौए को भोजन कराने की परंपरा काफी प्रचलित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कौए को पितरों से जुड़ा हुआ माना जाता है। इसलिए श्राद्ध के भोजन का एक हिस्सा कौए के लिए रखा जाता है।
कई परिवार गाय और अन्य जीवों को भी भोजन कराते हैं। इसे दया, सेवा और दान की भावना से जोड़ा जाता है।
7. जरूरतमंद लोगों को दान करें
तृतीया श्राद्ध के दिन अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, अनाज, वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तुएं दान की जा सकती हैं।
दान करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि इसका उद्देश्य दिखावा नहीं बल्कि सेवा और श्रद्धा होना चाहिए।
तृतीया श्राद्ध में क्या भोजन बनाया जाता है?
श्राद्ध के दिन सामान्य रूप से सात्विक भोजन तैयार किया जाता है। परिवार की परंपरा के अनुसार चावल, दाल, सब्जी, रोटी, खीर और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए जा सकते हैं।
कई परिवार श्राद्ध के भोजन में प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं करते। भोजन को साफ और सात्विक रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।
भोजन बनाने और परोसने के दौरान स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। परिवार की परंपरा में जिन खाद्य पदार्थों को वर्जित माना जाता है, उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।
तृतीया श्राद्ध में किन बातों का ध्यान रखें?
श्राद्ध कर्म श्रद्धा और शांत मन से करना चाहिए। इस दिन कुछ सामान्य बातों का ध्यान रखा जा सकता है:
- पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें।
- श्राद्ध स्थल और पूजा सामग्री की साफ-सफाई रखें।
- सात्विक भोजन तैयार करें।
- अनावश्यक क्रोध और विवाद से बचें।
- अपनी क्षमता के अनुसार दान करें।
- श्राद्ध कर्म में दिखावे से बचें।
- परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग का पालन करें।
- पिंडदान या विशेष अनुष्ठान की जानकारी न होने पर योग्य पुरोहित से सलाह लें।
श्राद्ध का मुख्य भाव श्रद्धा है, इसलिए बहुत अधिक खर्च करना आवश्यक नहीं माना जाता। व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही धार्मिक कार्य करना चाहिए।
तृतीया श्राद्ध और तीज श्राद्ध
तृतीया श्राद्ध को तीज श्राद्ध भी कहा जाता है। यह नाम तृतीया तिथि से जुड़ा हुआ है। इस श्राद्ध में शुक्ल और कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मृत्यु प्राप्त करने वाले पूर्वजों के लिए श्राद्ध करने की परंपरा बताई गई है।पितृ पक्ष में तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि प्रत्येक परिवार अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि के आधार पर संबंधित श्राद्ध दिवस चुनता है।
तृतीया श्राद्ध में दान का महत्व
श्राद्ध के दौरान दान को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना, भोजन कराना और उपयोगी वस्तुएं देना सेवा और पुण्य की भावना से जुड़ा हुआ है।
दान में अनाज, वस्त्र, भोजन या अपनी क्षमता के अनुसार अन्य वस्तुएं दी जा सकती हैं। दान की कीमत से अधिक महत्वपूर्ण दान के पीछे की भावना मानी जाती है।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति अधिक खर्च करने में सक्षम नहीं है, तो भी वह श्रद्धा से भोजन करा सकता है या अपनी क्षमता के अनुसार किसी जरूरतमंद की सहायता कर सकता है।
अगर मृत्यु तिथि पता न हो तो क्या करें?
कई बार परिवार को अपने पूर्वज की सही मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं होती। ऐसी स्थिति में श्राद्ध की तिथि तय करने के लिए परिवार के बुजुर्गों, पारिवारिक पुरोहित या योग्य विद्वान से सलाह ली जा सकती है।
धार्मिक परंपरा में यदि किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध करने की परंपरा भी बताई जाती है।
तृतीया श्राद्ध 2026: एक नजर में
| विवरण | जानकारी |
| श्राद्ध | तृतीया श्राद्ध |
| अन्य नाम | तीज श्राद्ध |
| तारीख | 29 सितंबर 2026 |
| दिन | मंगलवार |
| पक्ष | कृष्ण पक्ष |
| तिथि | तृतीया |
| तृतीया तिथि प्रारंभ | 28 सितंबर 2026, शाम 7:13 बजे |
| तृतीया तिथि समाप्त | 29 सितंबर 2026, शाम 5:09 बजे |
| पितृ पक्ष | महालय पक्ष |
निष्कर्ष
तृतीया श्राद्ध 2026 मंगलवार, 29 सितंबर को मनाया जाएगा। यह श्राद्ध उन पूर्वजों के लिए विशेष माना जाता है जिनका निधन तृतीया तिथि को हुआ था। तृतीया श्राद्ध को तीज श्राद्ध भी कहा जाता है। इस दिन पितरों का स्मरण, तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और दान जैसी परंपराएं निभाई जा सकती हैं। तृतीया तिथि 28 सितंबर की शाम से शुरू होकर 29 सितंबर की शाम तक रहेगी।
श्राद्ध कर्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता है। इसलिए इस दिन परिवार को शांत मन से अपने पूर्वजों को याद करना चाहिए और अपनी क्षमता के अनुसार धार्मिक कर्म करने चाहिए। विशेष पूजा, पिंडदान या मंत्र की विधि के लिए परिवार की परंपरा और योग्य पुरोहित का मार्गदर्शन लेना उचित रहेगा।
